रविवार, 3 अप्रैल 2011

"क्रोधी "नाम संवत्सर2011



उर्जा की आवृत्ति एवं कंपन्न के खोज का श्रेय हमारे महान ऋषियों व् तपस्विओ को जाता है जिन्होंने अपने दिव्या ज्ञान से ब्रम्हांड के रहस्यों का विस्तार पहले ही कर दिया था सम्पूर्ण जगत में जीवन ज्योति का चन्द्र के सहयोग से विस्तार करने वाले ग्रह राज सूर्य प्रत्यक्ष देव के रूप में प्रतिपल गतिशील है जो प्रकृति के नियामक और नियंता है प्राकृतिक आपदाए संतुलन का प्रतिक है किन्तु विपदाए मानव जनित हो तो निर्माण की प्रक्रिया ही विध्वंश का कारण बन जाती है वहां दैविक कोप को निमंत्रण देने की आवश्यकता नहीं पड़ती वर्तमान समय इसी विषमताओ के दौर से गुजर रहा है आज २६२ वर्षो के उपरांत" क्रौधी "नाम संवत्सर का आगमन हुआ है जो ८४ योजन आकाश और ८४ योजन पाताल का वो मापदंड है जो ब्रम्हा की क्रोधाग्नि से उत्पन्न होकर स्वयं नियति और नियंता बन कर हमारे समक्ष प्रकट हुआ है

इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सोमवार दिनांक ०४-०४-२०११ में "क्रोधी "नामक संवत्सर का प्रारंभ हो रहा है वर्ष प्रवेश तुला लग्न में होने जा रहा है ६ ग्रहणों के अनिष्टकारी परिणाम लिए वर्ष का राजा चन्द्रमा पाप ग्रहों के आधिपत्य में वर्ष का संचालन कर रहा है चन्द्रमा महिलाओ के शासन का प्रतीक है किन्तु शत्रु क्षेत्री होने के कारण शासक -प्रशासक की पकड़ स्थानीय क्षेत्र प्रदेश -देश में कमजोर होगी प्रजावर्ग में परस्पर द्वेष ,लोभ और क्रोध की बाहुलता समान्य जीवन को हताहत करेगा भूकंप .चक्रवाती तूफ़ान अग्निकांड ,दुर्घटनाये घटित होगी अग्नि त्रिकोण में ग्रहण पड़ने के कारण सत्ता के स्वामियो के लिए यह वर्ष अमंगलकारी है जनता में असंतोष ,धनधान्य के उत्पादनों में कमी किटजनित रोगों की उत्पत्ति व्यय का कारक बनेगी प्रशासको -शासको एवं राजनेताओ का जीवन षड़यंत्र की विशात पर होगा न्यायपालिका और कार्यपालिका में परस्पर विरोध उत्पन्न होगे राजनैतिक असंतोष बना रहेगा

शनि और मंगल का भौमिक भ्रमण धार्मिक आडम्बरो में वृद्धि करेगा स्थानीय एवं जिले के लिए संसाधनों की कमी रोष का कारण बनेगी

मध्यप्रदेश से अलग हुए राज्य छत्तीसगढ़ का उद्भव सिंह लग्न में हुआ है लग्नेश सूर्य शत्रुभाव में होने के कारण राज्य की समान्य प्रशासनिक व्यवस्था में कमी एवं गुप्त षड्यंत्र व् मंत्रणा के प्रभाव से पक्ष व विपक्ष पार्टियों द्वारा सरकार के अस्तित्व को खतरा बना रहेगा सत्तापक्ष के राजनेता अपने पुरुषार्थ से प्रदेश प्रदेश की संचार व्यवस्था ,वाणिज्य खनिज व् अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से आय के स्त्रोतों में वृद्धि करने का भरसक प्रयाश करेगे किन्तु मंहगाई अपने चरम सीमा में होगी सुरक्षा व्यवस्था में अत्यधिक व्यय होगा नक्सलवाद ,आतंकवाद और उग्रवाद में वृद्धि होंगी

स्वतन्त्र भारत का अभ्युदय वृषभ लग्न में होने के कारण भारत अपने निज बाहू बल से बिना अन्य राष्ट्रों का सहयोग से अपनी प्रगति एवं गौरव को ऊँचा रखने में समर्थ होगा किन्तु देश की आंतरिक गतिविधिया केन्द्रीय शासन को संकटकालीन स्थिति में पंहुचा सकती है किसी राजनेता की हत्या या मृत्यु राजनैतिक पृष्टभूमि में खलबली मचा सकती है राष्ट्रीय प्रतियोगिताओ में भारत सफल रहेगा सूर्य और शनि के आसन्न केंद्र योग ,मानवीय एवं प्राकृतिक आपदाओ के साथ नेतृत्व और नियंत्रण में क्षमता के आभाव में संवत्सर के अंत तक प्रभावशाली रहेगे

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

"चिकित्सा ज्योतिष "और आयुर्वेद

प्राचीन भारत की चिकित्सा पध्यति और आयुर्वेद में गहरा सम्बन्ध है आयुर्वेद में आयुतात्वो की विवेचना की जाती है और ज्योतिर्विज्ञान में कालतत्व का अध्यन किया जाता है जिसे कालचक्र कहते है आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा पध्यति पर आधारित है प्राचीन काल में योग ,मंत्र एवं मनोविज्ञान के द्वारा शल्यचिकित्सा की जाती थी तथा जडी -बूटियों से ओषधियो का निर्माण होता था आयुर्वेद एवं ज्योतिष दोनों का सम्बन्ध मानव से अलग नही है
ज्योतिर्विज्ञान में तारा पुंजो के तीन समुदाय है ,जिनका सम्बन्ध आयुर्वेद के त्रिदोष से है जब विज्ञानं ने इतनी प्रगति नही की थी तब जन्मांग चक्रो के आधार पर वैद्य रोगों का परिक्षण करते थे ,रोगी के बाह्य लक्षण उस आंतरिक रोग के परिचायक होते थे जन्मकुंडली रोग की सम्पूर्ण अवस्थावो को प्रर्दशित कर सकता है भौतिक चिकित्सा प्रणाली से अधिक सुक्ष्म एवं प्रभावशाली उपचार का माध्यम ज्योतिष शास्त्र है इस सौर मंडल में संचालित सभी मुलभुत शक्तियो का प्रतिनिधित्व ग्रह ही कर रहे है यही ग्रह हमारे शरीर पर भी प्रभाव रखते है जब विरोधी शक्तिया निषेधात्मक रश्मियों के रूप में हमारे आतंरिक ग्रह मंडल को बाधित करती है ,तब रोग की उत्पत्ति होती है एक चिकित्सक रोग होने पर केवल परिक्षण के उपरांत ही रोग क्या है ?यह बता पाता है ,किंतु अक योग्य देवज्ञ रोग होने से पूर्व ये घोषित करता है उसे अमुक रोग अमुक समय में होगा और अमुक समय तक रहेगा रोगी जिस समय देवज्ञ के पास आता है, उस समय की प्रश्न कुंडली बना कर ये ज्ञात कर सकते है की रोगी स्वस्थ होगा या नही ?यह रोग कब तक रहेगा ? यदि पूर्व ज्ञान हो तो चिकित्सा शास्त्र में आशातीत सफलता प्राप्त होते देर नही लगता कई बार अध्यात्मवाद ,ज्योतिष तथा इष्ट साधन बहुत सहायक होते है इस तथ्य को हम माने या न माने चिकित्सा शास्त्र हो या ज्योतिस्शास्त्र यह हमारे पूर्वजो की ही देन है
चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब का उपग्रह है समीप होने के कारन यह मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है
प्रत्येक जीव सूर्य ,चंद्रमा एवं अन्य ग्रहों ,१२ राशियो से प्रभावित होते है पृथ्वी सौरमंडल का महत्वपूर्ण हिस्सा है पृथ्वी में पाए जाने वाले प्रत्येक तत्व का सम्बन्ध ग्रहों से है मानव एवं संपूर्ण ब्रम्हांड एक दुसरे पर अन्योनाश्रित है
१२ रशिया कालपुरुष के विभिन्न अंगो का प्रतिनिधित्व करतीहैजो निम्न है :-
१.मेष :-सर मस्तिष्क ,मुख ,सम्बंधित हड्डिया
२.वृषभ :-गर्दन ,गाल .दाया नेत्र
३.मिथुन: -कन्धा ,हाथ ,श्वासनली .दोनों बाहू
४कर्क :-ह्रदय ,छाती ,स्तन ,फेफड़ा .पाचनतंत्र ,उदर
५.सिंह :-ह्रदय ,उदर ,नाडी ,स्पाईनल ,पीठ की हड्डिया
६.कन्या :-कमर ,आंत ,लिवर ,पित्ताशय ,गुर्दे और अंडकोष
७तुला :-वस्ति नितम्ब ,मूत्राशय ,गुर्दा
८.वृश्चिक :-गुप्तेंद्रिया ,अंडकोष ,गुप्तस्थान
९.धनु :-दोनों जंघे ,नितम्ब
१०.मकर :-दोनों घुटने ,हड्डियों का जोड़
११.कुम्भ :-दोनों पिंडालिया ,टाँगे
१२.मीन :-दोनों पैर .तलुए
राशियों के भांति ग्रह नक्षत्र में भी स्थायी गुन दोष है जिनके आधार पर रोगों के परिक्षण में सरलता आ जाता है

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

"अनंत ब्रम्हांड "




"अनंत "जिसका कोई अंत नही "ब्रम्हांड" कल्पना का वो शाश्वत स्वरूप जिसमे जीवन के आयाम जुड़े है जीवन का रहस्य कोई नही जानता "मृत्यु "से बड़ा सत्य जीवन में दूसरा कुछ नही ,वही जीवन के प्रति हमारा संघर्ष नित नयी मुसीबतों से गुजर रहा है lये जीवन हमें क्यो मिला इस जीवन का रहस्य क्या है ?ये जानना उतना ही आवश्यक है ,जितना की हमारा इस वर्तमान मे होना इस सृष्टी के लिए माने रखता है l"सत्य "तो ये है की प्रत्यक्ष देवता 'सूर्य 'के सिवाय कोई नही ,जिसे हम खुली आँख से देख सके lये वही "दिव्या 'स्त्रोत है ,जिससे ये सृष्टी देदीप्यमान है lजो "अनंत ब्रम्हांड "का नियामक हैl हमारा शरीर वो 'अन्तर ब्रम्हांडीय पिंड' है जो प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से इस अनंत ब्रम्हांड का प्रतिनिधित्व कर रहा है lकाल चक्र का प्रत्येक पल अपने आप मे दिव्यता लिए हुए है lहम वर्तमान मे !है यही हमारे जीवन का सत्य है lकाल के संकेतो से अनभिज्ञ हम अपने अस्तित्व पर गौर करे ,तो हम देश काल परिस्थिति के अनुरूप ,अपने आप ,को अपने ढंग से जीने को ही सर्वोपरि मानते है lहमारे इस बोद्धिक निर्णय में एक पल ऐसा जरुर आता है ,जहा हमारे हित -अहित, पाप -पुण्य ,धर्म- अधर्म ,अच्छई -बुराई आदि व्यवहार का स्मरण होने पर हमारे दोनों हाथ उस "सूक्ष्म सत्ता" के सामने झुक ही जाते है l वास्तव में मनुष्य के कार्य साधन का निर्णय 'काल 'चक्र ने पहले ही तय कर रखा है lजो देविक संकेत के रूप में "तरंग मध्यम "से हमारे चारो ओर व्याप्त lहै इन संकेतो को मानकर किस तरह जीवन में आनंद ओंर सफलता प्राप्त किया जा सकता है lइसे समझना होगा हमारा ज्योतिष शास्त्र इन्ही संकेतो पर आधरित है lप्राचीन मनीषियों द्वारा प्रकृति के बहुत करीब रह कर अपने आत्मज्ञान द्वारा काल के इन्ही दिव्य संकेतो का दर्शन ओर सतत चिंतन का आधार ही मानव जीवन को संस्कारित ओर संरक्षित किए हुए है lऋषि मुनियों ने प्रकृति के बहुत करीब रह कर इनके रह्श्यो का दर्शन किया तथा अपने आत्म चिंतन द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किए lयही आत्मीया एवं अध्यात्मिक ज्ञान हमें वेदा पुराण एवम उपनिषद के रूप में प्राप्त हुआ है lआज भी हमें इन ऋचाओ को जानने की आवश्यकता है की वेदों को किस प्रकार से मानव जीवन में उतारा जाये l
आत्म ज्ञान का मुख्य आधार वेद रहा जो श्री ब्रम्हा मुख से उच्चारित हुआ हैl वेदों में जो ज्ञान है वो पूर्णतः प्रकृति प्रार्थना पूर्वकहै lजिसको समझ पाना आज कठिन होगा l कालांतरमें सरलतम शोध होते रहे ,पर उन वाणी संग्रह को जीवन में उतरने की कल्पना मात्र रही है lवेद जब ज्ञान से परे हो गया तो उसे समझाने हमारे भारतीय ऋषियों ने उपनिषद की रचना की जो १०८हुए lउपनिषद कोई ज्ञान की कुंजी नही जिसे पढ़ कर ज्ञानवन विद्वान् हो जाए या मेधा शक्ति का उदय हो जाए ,समय समय पर हमारे गुरुजनों एवं ऋषि मुनियों ने अपने शिष्यों के बीच समाधान हेतु अपने शाब्दिक अर्थ से स्पष्ट किया की ज्ञानी के परम ज्ञान को प्राप्त करना है तो आपको उपनिषद होना होगा अर्थात" गुरु के समीप बैठना होगा "तभी आप वास्तविक ज्ञान को समझ सकते है l
उपनिषदों के अध्यन मात्र से ज्ञान प्राप्त होना सम्भव नही है ,तब शास्त्रों की रचना हुयी जो ६ हुएl उनमे सेएक हमारा 'ज्योतिष 'शास्त्र है जिसका उल्लेख ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में है lऔर अंत में व्याकरण हुए , जिसकी व्याख्या करने वाले कई मीलेगे किंतु इन शास्त्रों के मूल तत्वों को समझने और समझाने वाले विरले ही होंगे lआज हमे उस मूल को समझना होगा, उस शुन्य को समझना होगा जिसे ब्रम्हांड अर्थात" अनंत ब्रम्हांड "कहा जाता है l